पूरा पैसा एक FD में फंस गया है? यह सीढ़ी वाला तरीका हर साल देगा पैसा और ब्याज का भी रखेगा संतुलन, पढ़िए डिटेल्स
बैंक bank में पैसा Paisa रखकर तय ब्याज कमाना हो, तो सावधि जमा आज भी पहली पसंद बनी हुई है। लेकिन पूरी बचत को एक ही लंबी जमा में डाल देना कई बार गले की फांस बन जाता है, क्योंकि बीच में पैसों paiso की जरूरत पड़ जाए तो निकासी आसान नहीं रहती।इसी दिक्कत से निपटने का एक जाना-पहचाना तरीका है bank fd laddering liquidity, जिसमें कुल रकम को कई छोटी-छोटी जमाओं में इस तरह बांटा जाता है कि वे अलग-अलग तारीखों पर पूरी हों।
सोचिए, घर home में अचानक कोई बड़ा खर्च आ जाए और सारी बचत एक ही जमा में बंद हो। तब या तो वह जमा बीच में तोड़नी पड़ेगी, जिस पर जुर्माना लग सकता है, या फिर महंगा कर्ज लेना पड़ेगा। अलग-अलग समय पर पूरी होने वाली जमाएं इसी मोड़ पर काम आती हैं, क्योंकि हर कुछ समय बाद कोई न कोई रकम हाथ में आती रहती है।
एक रकम, पांच मंजिलें: सीढ़ी कैसे बनती है
उदाहरण से समझना आसान होगा। किसी के पास पांच लाख lakh रुपये rupye हैं, तो वह उन्हें एक साथ एक जगह रखने के बजाय पांच बराबर हिस्सों में बांट सकता है। हर हिस्से की अवधि अलग रखी जाए – पहला हिस्सा एक साल में पूरा हो, दूसरा 2 साल में, और इसी तरह पांचवां पांच साल years में। पहले साल के खत्म होते ही 1 लाख रुपये rupye वापस मिल जाएंगे।
उस वक्त अगर घर home में पैसों की दरकार हो, तो वह रकम काम आ जाएगी। और अगर दरकार न हो, तो उसी पैसे paiso को नए सिरे से लंबी अवधि की जमा में डाला जा सकता है। इस चक्र के चलते हर साल कोई न कोई जमा पूरी होती रहेगी और नकदी का सिलसिला टूटेगा नहीं। बेशक, अवधि का चुनाव election हर व्यक्ति को अपनी स्थिति और किसी प्रमाणित सलाहकार की राय के हिसाब से करना चाहिए।
ब्याज की चाल बदलने पर भी संतुलन कैसे रहता है
ब्याज दरें कभी ऊपर जाती हैं, कभी नीचे। जब दरें चढ़ती हैं, तो उस समय पूरी हो रही जमा को नई, ऊंची दर वाली जमा में बदला जा सकता है। जब दरें गिरती हैं, तब पहले से तय ऊंची दर वाली बाकी जमाएं अपनी अवधि पूरी होने तक उसी दर पर ब्याज देती रहती हैं। इस तरह पूरी रकम एक साथ दरों के उतार-चढ़ाव की चपेट में नहीं आती।
मगर इस तरकीब को रिटर्न return बढ़ाने का कोई जादुई फॉर्मूला formula समझना गलत होगा। यह सिर्फ जोखिम को फैलाने और नकदी बनाए रखने का तरीका है। सबसे ज्यादा कमाई की कोई गारंटी इससे नहीं मिलती। साथ ही, यह भी याद रखना चाहिए कि हर अचानक खर्च जमा की रकम से पूरा हो जाए, यह जरूरी नहीं। इसीलिए अलग से आपातकालीन राशि रखना भी उतना ही जरूरी है
किसके लिए ज्यादा काम की है यह तरकीब, और कहां है इसकी हद
जो लोग नौकरी job’s से हट चुके हैं, वे इस तरीके से अपनी आमदनी का क्रम तय कर सकते हैं – चाहे हर महीने mhine पैसा चाहिए हो, हर तिमाही या साल में एक बार। इसी तरह आने वाले बड़े खर्चों, जैसे नई गाड़ी, घर की मरम्मत या बच्चों की पढ़ाई study की फीस, की तारीख पहले से पता हो तो उसी के अनुसार जमाओं की अवधि चुनी जा सकती है, ताकि खर्च के वक्त पैसा तैयार मिले।
आखिर में हिसाब की एक बात और। जमा से असल में कितनी कमाई होगी, यह कई बातों पर टिका है – कितनी दर मिली, कितने समय के लिए पैसा Paisa रखा, ब्याज कैसे जुड़ता है, टैक्स tax कितना लगेगा और पूरी हुई रकम को फिर कहां लगाया गया। बीच में जमा तोड़ने पर जुर्माना भी कमाई घटा सकता है। इसलिए कोई भी फैसला festival लेने से पहले जमा की शर्तें पढ़ लें और जरूरत महसूस हो तो प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से बात कर लें।